गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

कृत्रिम बुद्धिमत्ताः यंत्रवत पत्रकारिता का दौर


इसी साल 18 मार्च की सुबह दिल्ली के एक पांच सितारा होटल के सभागार में उपस्थित लोग पत्रकारिता और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग का गवाह बने। इंडिया टुडे कॉनक्लेव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने आजतक चैनल ने एआई संचालित एंकर ’सना’ से सभी को परिचित कराया। सना ने अपना परिचय देते हुए समाचार भी पढ़े। पत्रकारिता के क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग आधारित देश की यह पहली घटना बनी। एआई एंकर ’सना’ अब इसी समाचार चैनल में पूर्णकालिक एंकर की तरह दिन भर में कई बार ताजा समाचार और हेडलाइन्स पढ़ती है। 

रोबोटिक ग्राफिक्स और टेक्स्ट टू स्पीच तकनीक आधारित समाचार पाठन का पहला प्रयोग चीन में हुआ था। वर्ष 2018 में, चीन की शिन्हुआ समाचार एजेंसी ने कंप्यूटर ग्राफिक्स का उपयोग करके दुनिया का पहला एआई-संचालित पुरुष समाचार एंकर बनाया था। इसी साल मार्च के महीने में रूस के ‘स्वोय टीवी’ ने स्नेज़ाना तुमानोवा को अपना पहला आभासी मौसम प्रस्तुतकर्ता के रूप में पेश किया था।

इसी साल मार्च के महीने में ही दुनिया का पहला समाचार चैनल जिसकी सामग्री पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधारित चैट जीपीटी द्वारा उत्पन्न की जाती है, को लॉन्च किया। चैट जीपीटी के सीईओ एलन लेवी ने इसे समाचारों की दुनिया में गेम चेंजर बताया। 

ऐसे ही प्रयोगों ने पत्रकारिता में मीडिया पेशेवरों के बीच आशंका और चिंता को बढ़ा दिया है। पहली जो आशंका है वह पत्रकारों की नौकरियों को लेकर है। दुसरी जो चिंता है उसमें कई मीडिया पेशेवरों को लगता है कि एल्गोरिदम और ऑटोमेशन पर बढ़ती निर्भरता पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कम कर देगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रोबोट के प्रसार ने मीडिया में यांत्रिकता के प्रयोग को बढ़ा दिया है। इसके सही और गलत की बहस पुरे विश्व में हो रही है भारत में भी यह चर्चा तेजी से मीडिया संस्थानों में प्रवेश कर रही है। भारतीय टीवी मीडिया में बहस विश्लेषण की जो संस्कृति पनपी है उसमें कई मीडिया विश्लेषकों को मानना है कि रोबॉट समाचार बुलेटिन तो पढ़ सकते हैं, लेकिन वे प्रतिक्रिया और बहस करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। एक खतरा इस बात का भी है कि एआई के समाचार या आलेख में डेटा की विश्वासनीयता संदिग्ध और पक्षपाती हो। एल्गोरिदम मनुष्यों द्वारा डिज़ाइन किए गए हैं, और ये पूर्वाग्रह से भरे भी हो सकते हैं। काफी आशंका है कि यह डेटा विश्लेषण को बदल कर परिणामों को संदिग्ध कर दें। 

इंटरनेट और पत्रकारिता

अखबार के दफ्तर में कम्प्युटर के आने पर भी इसी तरह की आशंका थी कि न्युज रुम छोटे हो जायेंगे, पत्रकारों की नौकरियां चली जायेंगी। आज की वस्तुस्थिति यही है कि कम्प्युटर ने पत्रकारिता को समृद्ध ही किया है। तकनीक और इंटरनेट के प्रयोग से पत्रकारिता काफी उन्नत ही हुई है। इंटरनेट का भविष्य भांपते हुए सभी मीडिया संस्थानों ने अपना ध्यान डिजिटल संस्करण की ओर दिया है। डिजिटल के अलग से संपादक और पत्रकार नियुक्त किए जा रहे हैं। यह स्थिति अखबारों के साथ साथ खबरिया टेलिविजन चैनलों की भी है। सभी का ज्यादा ध्यान डिजिटल पर है। परम्परागत मीडिया माध्यमों के साथ ही डिजिटल पत्रकारिता का समानांतर विस्तार हो रहा है। विश्व भर के मीडिया संस्थानों के आज करोड़ों समाचार आलेख, रिपोर्ट और फीचर से इंटरनेट भरा पड़ा है। हर दिन के सर्च में ये डेटा हमारे सामने आते रहते हैं। आज पत्रकारों को भी किसी विषय में शोध डेटा की जरुरत होती है तो वे भी इन सामग्रीयों का अकसर इस्तेमाल करते हैं। एआई भी अपने सर्च में इन्हीं आलेखों या समाचारों के डेटा का इस्तेमाल करता है। एआई आलेख तैयार करने के दौरान अपने एल्गोरिदम में भी इस डेटा के तथ्यों और सामग्रीयों का उपयोग करता है। यह भी सचाई है कि आज भी ग्राउंड रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता का विकल्प इंटरनेट या एआई नहीं हो सकता है। इन ग्राउंड रिपोर्टों से ही इंटरनेट की पत्रकारिता समृद्ध होती है। 


एआई की पत्रकारिता

डिजिटल पत्रकारिता आज और नए दौर में है। एआई ने डिजिटल माध्यमों में खोज और निर्माण को लगातार बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता को कई तरह से बदल रहा है। यह पत्रकारों के कार्य, डेटा का विश्लेषण करने, रुझानों की पहचान करने, समाचार और लेख लिखने जैसे कार्य करने में सक्षम है। साथ ही इन कार्यों में पत्रकारों की मदद भी कर रहा है। पत्रकारिता में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब एक वास्तविकता है। डिजिटल मीडिया के आगमन के कारण, हम अनजाने में हर जगह कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित सामग्री का उपभोग करने लगे हैं। यूट्यूब की अनुशंसित वीडियो, फेसबुक व इंस्टाग्राम के फ़ीड और नियमित वेबसाइटों के विज्ञापन ये सभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग के उदाहरण हैं। यहां तक की व्यक्तिगत रुचि के समाचारों का न्युज फ़ीड भी इसी तकनीक का हिस्सा है।

एआई बॉट मानव अवलोकन और अनुभव को दोहराने में सक्षम है। एआई के सबसे बड़े फायदों में से एक पैटर्न को पहचानने की क्षमता है। ऐसी प्रणालियों को वास्तविक रिपोर्ट और नकली रिपोर्ट के बीच अंतर को पहचानने के लिए किया जा सकता है। एआई की खासियत है कि वह पत्रकारों द्वारा प्रशिक्षित हो सकता है। सीख कर तथ्यात्मक जानकारी को एक साथ कैसे जोड़ सकता है। प्रेस विज्ञप्ति को स्वचालित रूप से पढ़ने योग्य लेख लिखने के लिए अनुमति देता है जो केवल तथ्यों की रिपोर्ट करता है। इस तरह की प्रणालियों को राय के टुकड़ों को अनदेखा करने के लिए भी प्रशिक्षित किया जा सकता है जो वर्णनात्मक भाषा का भारी उपयोग करते हैं, साथ ही साथ पत्रकारों को ईमानदारी और राय मुक्त टुकड़े लिखने की क्षमता के आधार पर रैंकिंग भी करते हैं। हमें एआई की इस चुनौती का सामना अनुकूलन के स्तर पर करना चाहिए। 

वाशिंगटन पोस्ट, बीबीसी और ब्लूमबर्ग जैसे प्रमुख मीडिया संगठन भाषा सॉफ्टवेयर की मदद से समाचार लेख प्रकाशित करने के लिए एआई का उपयोग कर रहे हैं। भारत में भी टाइम्स ऑफ इंडिया और दूसरे अखबार समुह अपने डिजिटल सामग्री को एआई के जरिये टेक्स्ट टू स्पीच का उपयोग कर रहे हैं। आज कई मीडिया संस्थान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग कर स्वचालित लेखन और अनुवाद में कर रहे है। दिन विशेष में कैलेंडर राइटिंग के लिए विशेषज्ञ पत्रकारों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब ऐसे लेख एआई के टूल आसानी से तैयार कर रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता की बहुत मदद की है। कई कंपनियों के पास इन-हाउस सॉफ्टवेयर हैं जो सेकंड या मिनटों में समाचार लेख तैयार कर सकते हैं। अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत डेटा है। अब, यह डेटा अंक, टेक्स्ट, ऑडियो या वीडियो के रूप में हो सकता है। सॉफ्टवेयर उन पर समाचार योग्य लेख उत्पन्न करने में सक्षम होगा।

बहरहाल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक बेहतरीन टूल है जिसके पत्रकारिता के क्षेत्र में कई फायदे हैं। यह अभी भी एक उभरती हुई तकनीक है, लेकिन कई समाचार संगठन पहले से ही एआई का उपयोग कर रहे हैं। साथ ही, हमें यह याद रखना चाहिए कि एआई एक ऐसी तकनीक है जो अभी तक पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है। इन तमाम चिंताओं और आंशकाओं से परे एआई और पत्रकारिता को आपस में काफी उन्नत होना है। इस आधार पर कृत्रिम बुद्धिमता का बेहतर प्रयोग पूरी तरह मानवी विवेक (आइक्यू) पर ही निर्भर है। हम एआई का बेहतर इस्तेमाल करते हुए पत्रकारिता को औ बेहतर कर सकते हैं।  


मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

रेडियो क्लबों से मोबाइल एप्प तक प्रसारण के नौ दशक

 

भारत में रेडियो क्लबों से शुरू प्रसारण आज सोशल मीडिया से होते हुए मोबाइल एप्प के जरिये हथेली में आ सिमटा है। नौ दशकों से भी लंबे समय में प्रसारण तकनीक के साथ और व्यापक हुआ है। आज भारत विश्व के सबसे बड़े प्रसारण उपभोक्ता वाला देश है। देश में प्रसारण की स्वायत संस्था ‘प्रसार भारतीआज  विश्व की सबसे बड़ी लोक प्रसारक संस्था है। प्रसारण का इतिहास रेडियो के प्रसारण के साथ ही माना जाता है। भारत में प्रसारण के महत्व से लोगों को अवगत कराने के लिए हर साल 23 जुलाई को ‘राष्ट्रीय प्रसारण दिवस’ ​​मनाया जाता है।

भारत में प्रसारण का आरंभ कलकत्ताबम्बईमद्रास और लाहौर में कुछ शौकिया लोगों के रेडियो क्लब के साथ हुआ था। रेडियो क्लब ऑफ कैलकटा वह पहला रेडियो क्लब था जिसने नवम्बर 1923 में कार्य करना आरंभ किया। इसके बाद मद्रास प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब ने मई 1924 को प्रसारण किया। उन दिनों प्रसारण से जुड़ी कई दिक्कतों के कारण सभी रेडियो क्लब आपस में सम्मिलित हो गए। इस विलय के बाद 1927 में एक निजी प्रसारण संस्था इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी लिमिटेड की स्थापना हुई। इस कम्पनी का पहला केन्द्र 23 जुलाई 1927 को बम्बई में खोला गया।  इसके साथ ही भारत में प्रसारण का विधिवत आरंभ माना जाता है। इसलिए हर साल 23 जुलाई को ‘राष्ट्रीय प्रसारण दिवस’ ​​मनाया जाता है।

सन1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का अधिग्रहण कर ‘इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस’ की  स्थापना की। जिसका नाम 1936 में बदल कर ‘ऑल इंडिया रेडियो’ किया गया। आजादी के समय ऑल इंडिया रेडियो के पास छह रेडियो प्रसारण केंद्र और ट्रान्समीटरों की संख्या 18 थी। जिनमें छह मीडियम वेब और 12 शॉर्ट वेब के ट्रांसमीटर थे। भारत सरकार संचार में रेडियो के महत्व को समझते हुए दो वर्षों में ही 25 नए प्रसारण केन्द्रों स्थापना की।

1957 में ऑल इंडिया रेडियो के अंदर दो महत्वपूर्ण बदलाव हुए जिसने रेडियो की लोकप्रियता में काफी इजाफा किया। इसी वर्ष ऑल इंडिया रेडियो को ‘आकाशवाणनाम दिया गयाऔर व्यावसायिक चैनल ‘विविध भारती’ का आरंभ किया गया। विविध भारती अपने हल्के फुल्के मनोरंजक कार्यक्रमों से बहुत कम समय में बेहद लोकप्रिय भी हो गया। आकाशवाणी और विविध भारती ये दोनों नाम लोगों की जुबान पर चढ़ गए। ‘आकाशवाणी’ तो रेडियो का पर्याय ही बन गया था।

60 का दशक भारत में प्रसारण के लिए कई बड़े बदलावों का दशक रहा। युनेस्को के सहयोग से भारत में टेलीविज़न प्रसारण कि शुरुआती परीक्षण चलाये गए। दो सालों के परीक्षण कार्यक्रम के परिणाम स्वरूप 1965 में स्वतंत्रता दिवस से देश में विधिवत टेलीविज़न प्रसारण का आरंभ हुआ। अपने आरंभिक दिनों से 1976 तक टेलीविज़न प्रसारण आकाशवाणी के साथ ही जुड़ा था। इसी साल सूचना प्रसारण मंत्रालय ने ‘दूरदर्शन’ नाम से टेलीविज़न प्रसारण को आकाशवाणी से अलग और स्वतंत्र पहचान दी।

इस समय टेलीविजन के आगमन ने रेडियो के लिए एक नयी चुनौती खड़ी कर दी थी। इस चुनौती में ही आकाशवाणी ने रेडियो प्रसारण के लिए नए मौके तलाशे। दूरदर्शन के अलग होने के एक साल बाद ही आकाशवाणी ने एफएम चैनलों की ओर कदम बढ़ाया। हालांकि एफएम रेडियो का पहला प्रसारण मद्रास से 1977 में हुआ। इसकी लोकप्रियता का असल वक्त 1993 में आरंभ हुआजब निजी कंपनियों को एफएम टाइम स्लाट उपलब्ध कराये जाने लगे और यह युवा जीवन शैली और लोकप्रिय संगीत का पर्याय बन गया। 1999 में व्यवसायिक एफएम चैनलों के लिए यह क्षेत्र खोल दिया गया। देखते देखते मेट्रो महानगरों  से होते हुए छोट-बड़े सभी शहरों में एफएम स्टेशनों  की बाढ़ सी आ गयी। आज एफएम के तीसरे चरण के साथ ही देश के 111 शहरों में 385 एफएम स्टेशन कार्यरत हैं। एफएम प्रसारण ने रेडियो को टेलीविज़न के बावजूद लोकप्रिय बनाए रखा है।
आकाशवाणी रेडियो प्रसारण को सूचना
शिक्षा और मनोरंजन के मूल उद्देश्यों से जोड़ते हुए कई प्रयोग करते रही है। एक बड़ा प्रयोग अप्रैल 1994 को स्काई रेडियो चैनल के जरिये किया गयाइसमें एफएम रिसीवर पर 20 रेडियो चैनल सेटेलाइट के जरिये उपलब्ध कराए गए। आज आकाशवाणी के देश भर में 487 केन्द्र सक्रिय हैं। इनमें विविध भारतीस्थानीय रेडियो स्टेशनऔर  क्षेत्रीय केन्द्र शामिल हैं। आज आकाशवाणी की पहुँच 99.19 फीसदी जनता और 92 प्रतिशत भारतीय क्षेत्र तक है। 
दुनिया के सबसे बड़े रेडियो समाचार संगठनों में से एक आकाशवाणी हर दिन 300 न्यूज बुलेटिन राष्ट्रीयक्षेत्रीय ओर विदेश सेवा के तहत प्रसारित करती है। इसके अलावा आकाशवाणी की घरेलू सेवा 653 ट्रांसमीटरों के जरिये देश के समस्त सांस्कृतिक और भाषायी क्षेत्रों के लिए उपलब्ध है।

1992 के बाद प्रसारण के क्षेत्र में स्थानीय समुदाय को जोड़ने की पहल की गई। इसके तहत स्थानीय रेडियो स्टेशन और सामुदायिक रेडियो के प्रयोग शुरू किए गए। सामुदायिक रेडियो स्थानीय लोगों की रुचि के आधार पर कार्यक्रम बनाते है और  प्रसारित करते हैं। इन कार्यक्रमों की छोटे छोटे श्रोता समूहों तक व्यापक पहुँच होती है।  यही कारण रहा कि स्थानीय विकासात्मक गतिविधियों के लिये ये स्टेशन काफी सफल साबित हुए। सामुदायिक रेडियो का बड़ा प्रयोग देश के विश्वविद्यालय कैम्पस में होने लगा।  देश के कई विश्वविद्यालयों में आज निजी सामुदायिक रेडियो शिक्षा और सूचना का अलख जगा रहे हैं। आज देश भर में 313 से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशन सक्रिय हैं।

आज तकनीक ने बहुत प्रगति कर ली है और दुनिया की सारी जानकारी हमारे एक क्लिक या टच पर उपलब्ध है। अब इंटरनेट क्रांति के बाद मोबाइल फोन ही टीवी और रेडियो का विकल्प बन कर सामने है। प्रसार भारती ने मोबाइल तकनीक की ओर भी अपने आप को तैयार किया है। इस के NewsonAIR मोबाइल ऐप के 10 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं। इस ऐप पर ऑल इंडिया रेडियो के सभी रेडियो चैनल को डिजिटल रूप में सुना जा सकता है। ऑल इंडिया रेडियो लाइव स्ट्रीम में दिसम्बर 2021 तक 18 मिलियन श्रोताओं ने न्यूजऑनएयर ऐप का उपयोग किया। इसके आंकड़ें साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं। इस एप्प पर ऑल इंडिया रेडियो की 240 रेडियो सेवाओं से अधिक की लाइव स्ट्रीम होती है।  ऑल इंडिया रेडियो स्ट्रीमों के न केवल भारत में बड़ी संख्या में श्रोता हैंबल्कि विश्व में 85 से अधिक देशों में इसके श्रोता हैं । वर्ष 2020 में,  दूरदर्शन और आकाशवाणी के डिजिटल चैनलों ने 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज कीएक अरब से अधिक डिजिटल दृश्य और 6 अरब से अधिक डिजिटल वॉच मिनट दर्ज किए गए हैं। अब आकाशवाणी के यूट्यूब चैनलों पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में हजारों घंटे की शैक्षिक सामग्री और टेलीक्लासेस उपलब्ध हैं।

2014 से भारत में रेडियो के माध्यम से एक ऐसे कार्यक्रम का प्रसारण आरंभ हुआजिसने देखते ही देखते फिर से रेडियो को दिलों में जिंदा कर दिया। यह कार्यक्रम है मन की बात। आज शहर ही नहींगांव-कस्बों में भी मन की बात कार्यक्रम को काफी पसंद किया जाता है। रेडियो के महत्व पर बात करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा था कि रेडियो जन-जन से जुड़ा हुआ माध्यम है। संचार में रेडियो की बहुत बड़ी ताकत और उसकी गहराई है। रेडियो की बराबरी कोई नहीं कर सकता।

शौकिया रेडियो क्लबों से शुरू प्रसारण नौ दशकों में आज स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया के लाइव स्ट्रीम तक पहुँच चुका है।  इन यूट्यूब चैनलों के जरिये छोटे गांवशहर और बड़े विमर्श की सामग्री डिजिटल उपलब्ध है। आज देश के हर प्रमुख शहर में जुनूनी युवा यूट्यूब के जरिये प्रसारण में शामिल हो रहे हैं। भारत के लोक सेवा प्रसारक प्रसार भारती ने अपने स्थापना काल से ही स्वतंत्र रूप में प्रसारण के सहजसुलभ और व्यापक विस्तार के लिए कई सारे उपाय किए। मोबाइल के दौर के साथ ही प्रसार भारती ने डिजिटल प्लेटफॉर्मों  में अपनी उपस्थिती दर्ज की। कार्यक्रमों की लाइव स्ट्रीमिंगसूचनापरक नए वेबसाइटयूटयूब चैनल्सपॉडकास्टमोबाइल एप्प और एलेक्सा पर कार्यक्रम की उपलबद्धता से प्रसार भारती ने व्यापक उपस्थिती दर्ज की है। सोशल मीडिया व्हाट्सएपफेसबुक और ट्विटर में भी प्रसार भारती की बड़ी उपस्थिती है।

शनिवार, 13 मार्च 2021

सिमडेगा जहां हॉकी जुनून भी, जलसा भी और हुजूम भी



वर्षों से यही लिखा जा रहा है सिमडेगा हॉकी की नर्सरी है। अब समय इससे आगे देखने का है। सिमडेगा हॉकी की बगिया है। हॉकी की यूनिवर्सिटी है। हॉकी यहां के खेत, खलिहानों और जंगल एवं पहाड़ों में बिखरा हुआ है। और जज्बा ... जज्बा तो यहां के जर्रे जर्रे में। तस्वीर देखिए। महिला जूनियर की टीम जब चिल्ली से फाइनल जीत कर लौटीं तो भव्य स्वागत हुआ। घर लौटी बेटियों के लिए पालकी लगाए गए। 
अपने घर आंगन में फुदकने वाली यह बेटियां चिल्ली के सनटियागो में कुलाचें भरने लगी तो प्रिंस ऑफ वेल्स की टीम 2-0 से धराशायी हो गयी। सिमडेगा की बेटियां सुनीता और सुषमा ने 48वें और 56वें मिनट में गोल दाग कर इस जीत का इतिहास लिखा। और साथ दिया सिमडेगा की तीसरी बेटी व्यूटी ने।

अब बात इस नर्सरी में पहले नेशनल हॉकी के आयोजन की-
यही तथ्य वर्षों से लोग मानते आ रहे हैं कि सिमडेगा हॉकी की नर्सरी है। अब यह भरम भी दूर होगा जब लोग समझेंगे की सिमडेगा हॉकी की बगिया है और हॉकी की यूनिवर्सिटी है। हॉकी यहां की संस्कृति है, यहां का "अंडर करंट" है। इस करंट को महसूस करना है तो आपको 10 मार्च से सिमडेगा में शुरू हो रहे महिला हॉकी सब जूनियर के मैच देखने यहां के एस्ट्रोटर्फ स्टेडियम में बतौर दर्शक शामिल होना होगा। जब 60 हजार यार्ड के मैदान में 22 खिलाड़ी अपने हॉकी स्टिक से सफेद बॉल का पीछा कर रहे होंगे तो उनके साथ सिमडेगा के लोगों का जुनून और जज्बा भी दौड़ रहा होगा। यकीन मानिए जोश और उल्लास के तेज स्वर को सुन कर आपकी भी नसों में उबाल आ जायेगा। मैदान में टीम कोई भी हो, हारे कोई भी टीम लेकिन जीतेगा तो सिमडेगा में हॉकी का उत्साह।  यही वह अंडर करंट है जो सिमडेगा और हॉकी को एक दूसरे से जोड़े रखता है। 
दरअसल, यह जानना भी दिलचस्प होगा की हॉकी सिमडेगा के लिए क्यों खास है। इसके लिए कुछ आंकड़े हैं जो तथ्य को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं। सिमडेगा में 60 से अधिक नेशनल और इंटरनेशनल खिलाड़ी हुए हैं। हर साल यह संख्या बढ़ती ही जाती है। इनमें दो खिलाड़ी ओलोम्पियन भी रहे हैं। एक छोटे से गांव  लट्ठाखम्हान का ही उदाहरण लें जहां इस राज्य की सबसे पुरानी हॉकी चैंपियनशिप पिछले 31 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही है। इस प्रतियोगिता में ही 60 से अधिक टीमें शामिल होती है। जिसमें झारखंड सहित उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बंगाल से भी टीमें हिस्सा लेती हैं। बोलबा प्रखंड के अवगा गांव में 50 टीमों के साथ स्थानीय प्रतियोगिता होती है। मेजर ध्यानचंद टूर्नामेंट, राधा कृष्ण मेमोरियल टूर्नामेंट, गांधी शास्त्री टूर्नामेंट, गोंडवाना विकास मंच चैंपियनशिप, जयपाल सिंह मुंडा टूर्नामेंट, बिरसा मुंडा स्कूल लेबल चैंपियनशिप, और अम्बेडकर टूर्नामेंट जैसे एक दर्जन से ज्यादा बड़े कैलेंडर टूर्नामेंट तो सिमडेगा में हरेक साल आयोजित होते हैं। इसके अलावे छोटे छोटे टूर्नामेंट जिसमें कटहल, मुर्गा और खस्सी टूर्नामेंट भी खूब खेले जाते हैं और लोकप्रिय भी हैं। यहां खिलाड़ी खेलते हैं, सिखते हैं और फिर देश विदेश तक का सफर तय करते हैं। 
जब साल भर गांव कस्बे के बच्चे इतनी सारी टूर्नामेंट में व्यस्त रहते हैं तब आप अनुमान लगा सकते हैं कि  सिमडेगा हॉकी के लिए नर्सरी है या कोई यूनिवर्सिटी है। वास्तव में हॉकी यहां की संस्कृति का आनंद और उल्लास है। जानकर भी कहते हैं कि सिमडेगा में हॉकी का उत्साह और हुजूम दोनों मिलता है। यहां के खेत खलिहानों में हॉकी का फिजिक खिलाड़ियों में डेवलप होता है। जंगल और पहाड़ों से हॉकी का स्ट्रेंथ मिलता है और यहां के पगडंडियों में चपलता और तेजी पाते हैं। आप जब कोलेबिरा से सिमडेगा आएंगे तब आप को कई बोर्ड मिलेंगे जिनपर लिखा होगा " जंगल हमारी आजीविका और संस्कृति है"। यही संस्कृति ही यहां खिलाड़ियों में हॉकी के गुण भरती है। यहां के बच्चे "सरीफा" और "बेल" के सूखे फलों से हॉकी का गेंद और बांस के जड़ को खोद कर हॉकी का स्टिक तैयार करते रहे हैं। यही जुनून उन्हें इंटरनेशनल और नेशनल खेलों तक पहुंचाती है। 
बहरहाल, सिमडेगा में हॉकी यहां की सबसे पुरानी टूर्नामेंट के दशकों  पहले से खेला जाता रहा है। यहां के हॉकी संस्कृति से निकले खिलाड़ियों में चपलता, तेजी और स्ट्रेंथ देखते बनती है। ये खिलाड़ी यह भी साबित करते हैं कि अभाव में भी प्रभाव कैसे रखा जाता है। तो आइए सिमडेगा में हॉकी का उत्साह, जुनून और अंडर करंट महसूस करने। यह देखने की हॉकी की नर्सरी अपनी मेजबानी में खेल का कैसे आनंद लेती है।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

लॉकडाउन रेडियो और संगीत

संगीत से सुबह संगीत से शाम 
इस लॉक डाउन में टीवी और मोबाइल से ऊब गए हैं तो रेडियो की फ्रीक्वेंसी ट्विन करने का समय है। रेडियो में रेनडमली अलग-अलग समय के गाने आपको अलग अलग कालखंड की संगीत की दुनिया में ले जाते हैं। आपके पसंद के अनुसार कस्टमाइज होकर नहीं बल्कि आपके यादों के अनुसार सरप्राइज की तरह। 80 और 90 का वह दशक था जब रेडियो संगीत की सुरम्य दुनिया की साथी हुआ करती थी। अपना बचपन और जवानी भी रेडियो की इसी मनोरंजक दौर से होकर गुजरी है। तब के गीतों में भी ट्रिपल, बेंजो, ढोलक, तबला, सेक्सोफोन, बांसुरी और सितार  जैसे परंपरागत वाद्य यंत्रों के प्रयोग से संगीत का बड़ा ही सुरम्य और मनोरंजक माहौल बनता था।  कुमार सानू, उदित नारायण, सोनू निगम, कविता कृष्ण मूर्ति, अनुराधा पौडवाल और अलका याग्निक की आवाज का जादू उन दिनों अपने पूरे सबाब पर  था। आज भी है। लेकिन तब इनके गाए प्रेम के गीत अपने इर्द गिर्द घूमते लगते थे। कशिश भरा स्वर और गहरे तक उतरते शब्द एक अलग ही दुनिया या कहें कल्पना लोक की ओर हमें ले जाते थे।  हम जो उन दिनों बच्चे थे इसी संगीत भरे माहौल में युवा हुए और आज भी ये संगीत हमारे यादों  के सुनहरे पन्नों में रचा बसा है। बस पलट कर यादों के पन्नों को उलटने की जरूरत भर है।

'डेक' और घड़े का वह "बॉक्स" और संगीत का संसार-
वह वक्त इतना हाईटेक नहीं था। तब हर घर में युवा अपने पास संतोष, पगारिया, बोस्टन, बोस और फिलिप्स जैसी कंपनियों  के म्यूजिकल डेक अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार रखते थे। और हां इनबिल्ड स्पीकर नहीं होते थे। डेक से दो तार निकाल कर घर के "कोने" में या "चौंकी" के नीचे बड़े वाले स्पीकर को घड़े में डाल कर रखा जाता था। और संभव होने पर कुछ छुटके वाले "ट्विटर" भी रखते थे। इतने जुगाड़ के साथ "रील" वाला "कैसेट" प्ले होता था। टी-सीरीज, एच एम वी, बॉम्बबिनो, वीनस, और सारेगामा जैसी कंपनियां फिल्मों के गीत से सजी कैसेट जारी करते थे। हर सप्ताह नई फिल्म के साथ नए कैसेट बाजार में होते थे और मुहल्ले में नई गीतों का कैसेट कौन बजाता है इस पर अघोषित प्रतियोगिता भी होते रहती थी। नई रिलिज्ड फिल्म के नई कैसेट लाने पर थोड़े तेज साउंड में गीत बजा कर हम बाहर भी निकलते थे कि देखो हमने यह कैसेट लिया है। दिन की शुरुआत इसी डेक की संगीत से होती थी और दिन भर अलग अलग कैसेट "साइड ए" और "साइड बी" के साथ बजते रहती थी। पूरा घर का माहौल इससे संगीतमय बना रहता था। बीच-बीच में मां-पापा की डांट तक यह संगीत का माहौल जारी ही रहता था। फिर डांट का असर खत्म होते ही फिर से वही संगीत वही मस्ती चालू रहती थी। इस संगीत का मजा यह था कि घर के काम काज के साथ अपना नाश्ता, खाना और पढ़ना भी इसी संगीतमय माहौल में हो जाता था। शहर के किसी भी गली मोहल्ले से गुजरते तो हर घर में बजते ये संगीत अपना मन मोह लेते थे। अमूमन हर घर का यही माहौल रहता था। कहीं "सैड" सांग तो कहीं प्रेम भरे गीत घर के युवा की हालात बयां करती थी।
 
ब्लूटूथ और कस्टमाइज संगीत-
आज ब्लूटूथ वाले हाईटेक बॉक्स हैं और डिजिटलाइज संगीत है। बस बजना चाहिए गाना वाले शानदार मोबाइल एप्प भी हैं। कान के कंटोपे वाले इयरफोन भी हैं। इतना सब कुछ पड़ा है। इयरफोन को किनारे रख इस बॉक्स में भी हो सके तो थोड़ा उस वक्त को जीकर देखिये। देखिये लॉक डाउन में समय को थोड़ा रिवाइंड करके। अपने चारों ओर संगीत को घोल कर देखिये। यह कुछ नया अनुभव देगा। 
@अभिषेक शास्त्री
लॉकडाउन खुराफ़ात

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

कब होगी मीडिया संस्कारों की घर वापसी


1880 की दशक में जब दो तरफा छपाई कर डालने वाली प्रिंटिग मशीनें पहली बार प्रकट र्हुईं तो समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ भी सामने आईं। इस प्रकार जब शब्दों का कारोबार खाससे मासतक पहुँचा तो उस समय मीडिया के सबसे बड़े पाठक थे- मजदूर और छोटे व्यापारी। मीडिया ने भी राजसी संरक्षण का लबादा फेंक डाला और वह लोक परक बन गयी। शक नहीं कि मीडिया जन्म से ही लोकपक्षीय रही है। चाँद, उदन्त मार्तण्ड, गणवाणी, स्वदेश मित्र, वन्दे मातरम्, कर्मयोगी जैसी स्वनामधन्य  पत्रिकाओं का एक लम्बा सिलसिला हिंदी पत्रिकारिता में रहा है जो जन-सरोकार समेटने में हमेशा अग्रणी रहे।
 दरअसल  आजादी के उपरान्त दिनमान’, ‘किसान’, ‘रविवार’, आदि पत्रिकाएँ मुख्यतः आम आदमी के उपर ही केन्द्रित रहीं। बहरहाल, जब से इलेक्ट्रोनिक मीडिया, खासकर, प्राइवेट टेलिवीजन चैनलों का पर्दापण हुआ है, मीडिया जन-सरोकारों से लगातार दूर छिटकती जा रही है। विज्ञापनों की लाचारी के कारण और बड़ी पूँजी के शामिल होने के कारण कह लें, टेलिवीजन का पूरा कारोबार एक तरह से भोगवादी विलासिता और कन्ज्यूमरिज्म की ओर ढुलक रहा है। नैतिकता की दुहाई देकर लक्षित किये हुए लोगों की बखिया उधेड़ने वाले अधिकांश  टी. वी. चैनल खुद 10 जोड़ 2 के उस नियम का खुल्लमखुला उल्लंघन करते हैं जिसके तहत एक घण्टे में वे अधिकतम 12 मिनट ;10 मिनट बाजार का एवं 2 मिनट अपने चैनल का ही विज्ञापन चला सकते है। फिजिब्लिटिके नाम पर गत 3 वर्षों से बहुतेरे चैनल इस अनुशासन का उल्लंघन करते जा रहे हैं।  देखा-देखी प्रिंट मीडिया भी विज्ञापन परस्त होती जा रही है।
अखबारों के दफतर पर पहले ही बताया जा रहा है कि अधिक विज्ञापन आ गये तो खबरों में कटौती होगी।
बहरहाल जिस पत्रिकारिता ने 1917 की रुसी बोलशेविक क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाई आज वही पत्राकारिता जनादोलनों को भोथर बनाने में सक्रिय है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को जिस पत्रकारिता ने जनांदोलन बनाया आज वही पत्रकारिता जनविमुख हो रहा है।