और चवन्नी चली गई। हमारे आपके हम सबके बीच से चवन्नी चली गई दबे पांव या चुपचाप नहीं। बकायदा पूर्व घोषण और डंके की चोट पर चवन्नी ने विदा ली है…. ताज्जुब तो यह है कि चवन्नी को सभी ने जाते हुए देखा लेकिन किसी ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की। ना कोई धरना, विरोध, सत्याग्रह और अनशन। सभी ने जाने दिया चवन्नी को।…. और इस तरह 30 जून 2011 से चवन्नी हमारे बीच नहीं रही। अलविदा चवन्नी….!
चवन्नी तुम जहां रहना खुश रहना। तुम जिसके पास भी होगी वो तुम्हें खर्च नहीं कर सकता। तुम्हारा धारक कब तक तुम्हें धरेगा, कब तक तुम से मोह रखेगा यह तो उसकी मुहब्बत की इच्छाशक्ति पर निर्भर है। यही वजह है कि तुम्हारी दीर्घायु की कामना भी हम नहीं कर सकते हैं। घर की गुल्लकों से अब तुम बाजार भी नहीं आ सकती हो। आगे की जिंदगी तुम्हारी कैद में ही बितेगी। अब ना तो तुम हाथों में फुदक सकती हो, ना हीं जेब में छनक सकती हो, ना तो पर्स में ठनक सकती हो और ना ही गुल्लक में खनक सकती हो। आरबीआई ने तो तुम्हारे पंख हीं कतर दिए हैं।
चवन्नी 1950 में तुम आई थी, 61 वर्ष की होकर तुम जा रही हो। इतने में तो आदमी भी रिटायर हो जाता है, और जो नहीं होता वो रिटायर हर्ट हो जाता है। चवन्नी डायनासोर की तरह तुम विलुप्त नहीं होना। हम तुम्हें स्पीलबर्ग की मूवी में नहीं देखना चाहते। चवन्नी तुम फिल्मों में आओगी तो सबको बहुत रूलाओगी।
चवन्नी तुम बिछुड़ कर भी हम सब से जुड़ी रहोगी। सभी मुद्राओं में तुमने हीं तो हमसे आत्मीय लगाव रखी थी। तुमने हीं तो होठों की दबी हंसी को गालों में बिखेर कर चवन्नीया मुस्कान दी, आम आदमी के खड़ुसपने को चवन्नी छाप की पहचान दी। आदमी के इतना नजदीक और कोई मुद्रा नहीं रही। तुमने आम आदमी से जुड़ कर खुद को अमर बना लिया है।