प्यारी चवन्नी शुभ प्यार
तुम्हारे जाने की खबर सुनी
बहुत दुख हुआ।
अभी तो लगता है
तुम्हें कल ही देखा था
लेकिन महिनों से तुम्हें नहीं छूआ ।।
तुम यूं ही अचानक जा रही
तुम्हारी कितनी सुनहरी यादें
हमारी दिलों में हैं बसी।
जब भी परचून की दुकान या,
मेले और चौराहे के ठेले में
बचत की तरह तुम हाथ आती थी।
तब तुम फुदकती थी हाथों में
जेब में छनकती और उछलती थी
गुल्लक में जाते हीं
तुम कितना खनकती थी।।
प्यारी चवन्नी
यह तुम हीं थी जिसने
मानवीय भावना से संबंध बनाया
होठों की दबी हंसी से
गाल गुलाबी कर चवन्नीया मुस्कान दी।
आदमी के बिंदासपने को
किया परिभाषित और चवन्नी छाप पहचान दी।।
चवन्नी तुम्हें पता है
अपने छूटपन में
जब मां ने एक रूपए दिए थे।
तब उससे दो माचिस और
स्टोव के दो पिन लिए थे।
और दुकान वाले ने बचत में
एक चवन्नी हाथ में थमायी थी
उस एक चवन्नी से मैंने
एक टॉफी खरीदी थी
लाल पन्नी में लिपटी
नारंगी सी गोल टॉफी
उस टॉफी को कभी बॉंए और
कभी दॉंए मुँह में घुमाते हुए
उछलता कूदता अपने घर आता था
तब तुम आरेंज सी स्वाद में बहुत भाई थी।।
चवन्नी तुम्हें क्या बताउं तुम्हारा कमाल
जब पहली बार कॉलेज गया था
हर ओर मस्ती और सब कुछ नया था
क्लास में गोरी छोरी ने
पहली बार कलम क्या मांगा
मैं तो समझा भीड़ गया टांका।।
और जब उसने कलम लौटायी
क्या गजब की मुस्कुरायी
उसके सुर्ख होंठों की दबी हंसी
गालों को गुलाबी कर गयी।
चेहरे में उसके तुम्हें देख
मैंने भी चवन्नीया मुस्कान दी
इस मुस्कुराहट ने हमारे तार
कुछ ऐसे जोड़ दिए की
आगे के लिए हम एकसाथ हो लिए।।
चवन्नी, समय हरदम एक सी नहीं रहती
मस्ती हुई खत्म तो, चेहरे पर हंसी नहीं रहती
इधर जिंदगी में कुछ अजीब सा
अपने आप हो गया हूँ।
दोस्त कहने लगे कभी रूपया था
अब चवन्नी छाप हो गया हूँ।।
चवन्नी तुम जा रही हो
लेकिन बहुत याद आओगी ।
कंच्चे और गोली वाले खेल में
गुल्लक बचत की झगड़े और मेल में
आइसक्रीम की भोंपू और ठेले में
परचुन की दुकान और सलाना मेले में
तुम अपनी यादों से हमें सताओगी।।
अच्छा चवन्नी अब
कलम रखता हूँ
पाती में लिखा है कम
तुम समझना ज्यादा
आखिर यही तो है
एक चवन्नी होने का इरादा।।
……………. अभिषेक शास्त्री
आवारा चवन्नी छाप