मंगलवार, 31 मार्च 2020

लॉकडाउन रेडियो और संगीत

संगीत से सुबह संगीत से शाम 
इस लॉक डाउन में टीवी और मोबाइल से ऊब गए हैं तो रेडियो की फ्रीक्वेंसी ट्विन करने का समय है। रेडियो में रेनडमली अलग-अलग समय के गाने आपको अलग अलग कालखंड की संगीत की दुनिया में ले जाते हैं। आपके पसंद के अनुसार कस्टमाइज होकर नहीं बल्कि आपके यादों के अनुसार सरप्राइज की तरह। 80 और 90 का वह दशक था जब रेडियो संगीत की सुरम्य दुनिया की साथी हुआ करती थी। अपना बचपन और जवानी भी रेडियो की इसी मनोरंजक दौर से होकर गुजरी है। तब के गीतों में भी ट्रिपल, बेंजो, ढोलक, तबला, सेक्सोफोन, बांसुरी और सितार  जैसे परंपरागत वाद्य यंत्रों के प्रयोग से संगीत का बड़ा ही सुरम्य और मनोरंजक माहौल बनता था।  कुमार सानू, उदित नारायण, सोनू निगम, कविता कृष्ण मूर्ति, अनुराधा पौडवाल और अलका याग्निक की आवाज का जादू उन दिनों अपने पूरे सबाब पर  था। आज भी है। लेकिन तब इनके गाए प्रेम के गीत अपने इर्द गिर्द घूमते लगते थे। कशिश भरा स्वर और गहरे तक उतरते शब्द एक अलग ही दुनिया या कहें कल्पना लोक की ओर हमें ले जाते थे।  हम जो उन दिनों बच्चे थे इसी संगीत भरे माहौल में युवा हुए और आज भी ये संगीत हमारे यादों  के सुनहरे पन्नों में रचा बसा है। बस पलट कर यादों के पन्नों को उलटने की जरूरत भर है।

'डेक' और घड़े का वह "बॉक्स" और संगीत का संसार-
वह वक्त इतना हाईटेक नहीं था। तब हर घर में युवा अपने पास संतोष, पगारिया, बोस्टन, बोस और फिलिप्स जैसी कंपनियों  के म्यूजिकल डेक अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार रखते थे। और हां इनबिल्ड स्पीकर नहीं होते थे। डेक से दो तार निकाल कर घर के "कोने" में या "चौंकी" के नीचे बड़े वाले स्पीकर को घड़े में डाल कर रखा जाता था। और संभव होने पर कुछ छुटके वाले "ट्विटर" भी रखते थे। इतने जुगाड़ के साथ "रील" वाला "कैसेट" प्ले होता था। टी-सीरीज, एच एम वी, बॉम्बबिनो, वीनस, और सारेगामा जैसी कंपनियां फिल्मों के गीत से सजी कैसेट जारी करते थे। हर सप्ताह नई फिल्म के साथ नए कैसेट बाजार में होते थे और मुहल्ले में नई गीतों का कैसेट कौन बजाता है इस पर अघोषित प्रतियोगिता भी होते रहती थी। नई रिलिज्ड फिल्म के नई कैसेट लाने पर थोड़े तेज साउंड में गीत बजा कर हम बाहर भी निकलते थे कि देखो हमने यह कैसेट लिया है। दिन की शुरुआत इसी डेक की संगीत से होती थी और दिन भर अलग अलग कैसेट "साइड ए" और "साइड बी" के साथ बजते रहती थी। पूरा घर का माहौल इससे संगीतमय बना रहता था। बीच-बीच में मां-पापा की डांट तक यह संगीत का माहौल जारी ही रहता था। फिर डांट का असर खत्म होते ही फिर से वही संगीत वही मस्ती चालू रहती थी। इस संगीत का मजा यह था कि घर के काम काज के साथ अपना नाश्ता, खाना और पढ़ना भी इसी संगीतमय माहौल में हो जाता था। शहर के किसी भी गली मोहल्ले से गुजरते तो हर घर में बजते ये संगीत अपना मन मोह लेते थे। अमूमन हर घर का यही माहौल रहता था। कहीं "सैड" सांग तो कहीं प्रेम भरे गीत घर के युवा की हालात बयां करती थी।
 
ब्लूटूथ और कस्टमाइज संगीत-
आज ब्लूटूथ वाले हाईटेक बॉक्स हैं और डिजिटलाइज संगीत है। बस बजना चाहिए गाना वाले शानदार मोबाइल एप्प भी हैं। कान के कंटोपे वाले इयरफोन भी हैं। इतना सब कुछ पड़ा है। इयरफोन को किनारे रख इस बॉक्स में भी हो सके तो थोड़ा उस वक्त को जीकर देखिये। देखिये लॉक डाउन में समय को थोड़ा रिवाइंड करके। अपने चारों ओर संगीत को घोल कर देखिये। यह कुछ नया अनुभव देगा। 
@अभिषेक शास्त्री
लॉकडाउन खुराफ़ात