1880 की दशक में जब दो तरफा छपाई कर डालने वाली प्रिंटिग मशीनें पहली बार
प्रकट र्हुईं तो समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ भी सामने आईं। इस प्रकार जब शब्दों का
कारोबार ‘खास’ से ‘मास’ तक पहुँचा तो उस समय मीडिया के सबसे बड़े पाठक
थे- मजदूर और छोटे व्यापारी। मीडिया ने भी राजसी संरक्षण का लबादा फेंक डाला और वह
लोक परक बन गयी। शक नहीं कि मीडिया जन्म से ही लोकपक्षीय रही है। चाँद, उदन्त मार्तण्ड, गणवाणी, स्वदेश
मित्र, वन्दे मातरम्, कर्मयोगी जैसी
स्वनामधन्य पत्रिकाओं का एक लम्बा सिलसिला
हिंदी पत्रिकारिता में रहा है जो जन-सरोकार समेटने में हमेशा अग्रणी रहे।
दरअसल आजादी के उपरान्त ‘दिनमान’,
‘किसान’, ‘रविवार’, आदि
पत्रिकाएँ मुख्यतः आम आदमी के उपर ही केन्द्रित रहीं। बहरहाल, जब से इलेक्ट्रोनिक मीडिया, खासकर, प्राइवेट टेलिवीजन चैनलों का पर्दापण हुआ है, मीडिया
जन-सरोकारों से लगातार दूर छिटकती जा रही है। विज्ञापनों की लाचारी के कारण और बड़ी
पूँजी के शामिल होने के कारण कह लें, टेलिवीजन का पूरा
कारोबार एक तरह से भोगवादी विलासिता और कन्ज्यूमरिज्म की ओर ढुलक रहा है। नैतिकता
की दुहाई देकर लक्षित किये हुए लोगों की बखिया उधेड़ने वाले अधिकांश टी. वी. चैनल खुद 10 जोड़ 2 के उस नियम का खुल्लमखुला उल्लंघन करते हैं जिसके तहत एक घण्टे में वे अधिकतम
12 मिनट ;10 मिनट बाजार का एवं 2 मिनट अपने चैनल का ही विज्ञापन चला सकते है। ‘फिजिब्लिटि’
के नाम पर गत 3 वर्षों से बहुतेरे चैनल इस
अनुशासन का उल्लंघन करते जा रहे हैं।
देखा-देखी प्रिंट मीडिया भी विज्ञापन परस्त होती जा रही है।
अखबारों
के दफतर पर पहले ही बताया जा रहा है कि ‘अधिक विज्ञापन आ गये तो खबरों में कटौती होगी।’
बहरहाल
जिस पत्रिकारिता ने 1917 की रुसी बोलशेविक क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाई आज वही पत्राकारिता
जनादोलनों को भोथर बनाने में सक्रिय है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को जिस पत्रकारिता
ने जनांदोलन बनाया आज वही पत्रकारिता जनविमुख हो रहा है।