न खिचो कमानों को न तलवार निकालो ।
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो । ।
पत्रकारिता से दो खबरों ने स्तब्ध कर दिया । पहली ख़बर गोवाहाटी से यहाँ के एक दैनिक अखबार "दैनिक अजी " के संपादक मजमुदार की हत्या कर दी गयी । श्री मजमुदार एक दशक से पत्रकारिता कर रहे थे । वे कहते थे की अख़बार में ख़बर छपने के कारन उनकी हत्या भी हो सकती है ।
दूसरी घटना है रांची स्थनीय अखबार का । अखबार के संपादक ने बोटम लीड
ख़बर में एक लेख छापा था । उस ख़बर का मजमून था की चुनाव के दौरान पार्टी के प्रत्यशी ,पार्टी की तैयारी और पार्टी के दौरे की खबरों को अधिक महत्त्व दिया जाता है । खास कर उनसे जुड़े विज्ञापन को भी ख़बर बना कर प्रस्तुत किया जाता है , बिल्कुल बड़ी ख़बर की तरह ।
तीसरी घटना है जिसका जिक्र ऊपर नही किया गया है । घटना ख़ुद हमारे साथ घटी है , हम स्थानीय सांसद के कार्यकाल के आकलन के लिए पब्लिक ओपिनियन ले रहे थे । कुछ भीड़ जमा हुई । एक नवजवान कह उठा अरे मीडिया वाले सिर्फ् बाजार में हवा बनाने के लिए आते हैं न तोखाबर चलाएंगे और न ही इससे कुछ होगा सबकुछ मैनेज रहता है । मेरे साथ खड़े पत्रकार बंधू उग्र होते होते नही हुए।
बेशक अब सब कुछ मैनेज होता है । ख़बर से लेकर अख़बार तक । यह दौर मैनेजमेंट का है । अख़बार के आवरण से लेकर ख़बर की अंतर्वस्तु तक सब कुछ व्यवसायीक पर्बंधन का ही हिस्सा है। मीडिया में समाचार और संपादक जैसे संस्था भी विलुप्त हो रहें है । अब मीडिया का सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण विभाग है मैनेजमेंट का । समाचार और कंटेंट की जगह विज्ञापन अख़बार का आधार बन गया है । तो एस परिस्तिथि और स्तिथि में में मैनेज तो खबरें होगी ही ।
दरअसल यह युगधर्म ही है मीडिया जैसी संस्था की सामाजिकता के विलुप्त होने का । जब से मीडिया में प्रोफसशन लिजम आया तो यही सोशलिज्म समाप्त हो गया है । प्रोफशनल व्यक्ति और संस्था के प्रति गंभीर होता है । समाज के प्रति नही । मीडिया के इन विन्दुओं पर दृष्टि डालते हुए एक नेशनल चैनल के प्रमुख का कहना भी है की हम सोशल वर्क नही कर रहे हैं । लेकिन हम चैरिटी कर रहे हैं । बिल्कुल सही है मीडिया एक चैरिटी है । जहाँ सामाजिकता के पैसे लगते हैं । लेकिन ऊपर के जो उदाहरण हैं संपादक को मरने या विज्ञापन को ख़बर बनाने का उससे आम आदमी आहत है । आज मीडिया की चर्चा गली मुहलों तक पहुच गयी है । पान की दुकान में बैठे गप्पबाज मीडिया की ऐसी तैसी बतियातें हैं । और पान के जुगाली का मजा लेतें हैं। संकेत साफ है आम आदमी का विश्वास अख़बार ,ख़बर और पत्रकारिता से उठ रहा है ।
धीरे -धीरे ही सही जनता मीडिया के प्रति उग्र होती जा रही है । इसलिए ही तो पत्रकार भी पिटते नजर आ रहें हैं । आज सड़क छाप लोग भी ख़बर के मैनेज की भाषा समझ गए हैं । लोगो की आँखों के सामने जो संच गुजरता है और जब ख़बर छपती है तो सत्य के साथ बलात्कार साफ नजर आता है ।