प्रभाष जोशी से मिलना तो न हुआ लेकिन जिन दिनों पत्रकार बनाने की इच्छा मेरे अन्दर कुलबुला रही थी . और वर्तमान समय के पत्रकारिता के दोष सामने आ रहे थे . वैसे कठिन समय में प्रभाष जी के लेख ने ठाठ्स बंधाया और मीडिया के क्षेत्र में अलोकिक राह दिखाई. हालाकिं प्रभाष जी के विषय में तब और अधिक जाना जब प्रभाष जी के साठवे जन्म दिवस पर प्रकशित किताब - प्रभाष जोशी - ६० ( वाणी प्रकाशन ) पढने का मौका मिला . आलोक तोमर की संकलन में छपी यह किताब प्रभाष जी के व्यक्तित्व के सारे आयामों को रेखांकित करती है . हालाकिं प्रभाष जोशी इस प्रतिनिधि संकलन से कहीं ऊपर रहें हैं जिसकी पुष्टि भी यही किताब करती है. हर नए पत्रकार और पत्रकारिता के छात्रो के लिए यह किताब मिशनरी पत्रकारिता की रोड मैप की तरह है.------
प्रभाष जोशी पत्रकारिता में आम आदमी के अनुकूल शब्दों के प्रयोग करने के पहले पैरोकार थे. प्रभाष जी को यह गुण विरासत में मिली है . प्रभाष जी के लेखन के पीछे उनकी बौधिक प्रखरता और भाव प्रवणता को प्रमुख गुण रहा है . प्रभाष जी का लेखन चाहे क्रिकेट , टेनिस पर हो या किसी ताजा राजनितिक घटनाक्रम पर तभी श्रेष्ठ हुआ है जब उसमे उनकी भावना जुडी हैं . भावना के स्तर पर उत्साहित , उदास , विचलित , क्षुब्ध या आंदोलित होकर ही उनकी लेखकीय प्रतिभा अपनी धारदार उत्कृष्टता को प्राप्त होती रही है .
1992 में बाबरी विध्वंस के बाद प्रभाष जी में एक सामाजिक वैचैनी दिखी थी. प्रभाष जी एक कुशल संपादक के अलावे बड़े ही सजग नागरिक रहे और समस्याओ के प्रति उनका दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहा है, इस समस्या के उचित समाधान कि राह खोजने कि कोशिश करते रहे.
आपातकाल और जे पी आन्दोलन के दौरान आन्दोलन को ख़बरदार बनाये रखने के लिए किसी अख़बार कि जरुरत थी. ऐसे में प्रजानिति साप्ताहिक कि शुरुआत प्रभाष जी ने किया . आपातकाल के दौरान जहाँ बहुत सारे भूमिगत गतिविधिया चलती थी वहा कई लोगो के नाम बदल कर बातें करने का चलन था.प्रभाष जी को एच वाई के नाम से जाना जाता था . प्रभाष जी अपना दुःख बेहद व्यक्तिगत रखते थे जबकि सुख हमेशा सार्वजनिक होता था.
मुंगावली में चम्बल के डाकुओ का जे पी के सामने समर्पण और सर्वसेवा संघ के सेवा ग्राम तक जवाहरलाल ने प्रभाष जी लड़ाकू मुद्रा देखी थी. जवाहरलाल अज्ञेय , रघुवीर सहाय और प्रभाष जोशी में संपादक के रूप में प्रभाष जोशी का चयन करते हैं. इसके पीछे उनका तर्क था जनसत्ता के सम्पादकीयों , अग्रलेखो और चौपाल के पत्रों का संपादन प्रभाष जी ने कई वर्षो तक खुद ही किए . प्रभाष जी एक लिखाड़ संपादक थे . अगर वो लिखना चाहे तो वो वर्षों तक लिखते रहते .
मुंगावली में चम्बल के डाकुओ का जे पी के सामने समर्पण और सर्वसेवा संघ के सेवा ग्राम तक जवाहरलाल ने प्रभाष जी लड़ाकू मुद्रा देखी थी. जवाहरलाल अज्ञेय , रघुवीर सहाय और प्रभाष जोशी में संपादक के रूप में प्रभाष जोशी का चयन करते हैं. इसके पीछे उनका तर्क था जनसत्ता के सम्पादकीयों , अग्रलेखो और चौपाल के पत्रों का संपादन प्रभाष जी ने कई वर्षो तक खुद ही किए . प्रभाष जी एक लिखाड़ संपादक थे . अगर वो लिखना चाहे तो वो वर्षों तक लिखते रहते .
सूर्य प्रकाश चतुर्वेदी प्रभाष जोशी के क्रिकेट रिपोर्टिंग के दीवाने हैं. यह प्रभाष जोशी ही हैं जिन्होंने खेलो पर हिंदी में जीवंत टिपणी करने का सराहनीय कार्य किया . क्रिकेट और खेल की रिपोर्टिंग में प्रभाष जोशी ने बोलचाल के साथ चालू भाषा का प्रयोग जम कर किया . सिर्फ यही नहीं प्रभाष जोशी ने खेल की खबरों को पहले पन्ने तक पहुचाया और पूरा का पूरा एक पेज खेल के नाम पर समर्पित किया जो आज लगभग हर अख़बार का जरुरी फोर्मेट बन गया है.
यह प्रभाष जोशी थे जिन्होंने रेडियो और टी वी मिडिया पर समीक्षात्मक लेख व् टिप्पणिया अपने अख़बार में छपने शुरू किये . कॉलम था देखि सुनी और लेखक थे सुधीश पचौरी . सुधीश जी प्रभाष जोशी को मानवता वादी गांधीवादी और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में पाते हैं. प्रभाष जी का यह आग्रह उनके अख़बार में भी दीखता था. चौरासी के दंगो में जनसत्ता एक अलग किस्म का अख़बार बन जाता है. दंगे की खबरे और अखबारों में भी थी लेकिन जो ह्रदय द्रावक रिपोतार्ज , मर्मान्तक और करुनाकलित कथाये जो यहाँ हैं वे अन्यत्र नहीं थी. भोपाल त्रासदी में भी जनसत्ता मुकाबले में आता है . मंडल मंदिर का मसला जब जोड़ पकड़ता है ऐसे समय में प्रभाष जोशी प्रत्यक्ष होने लगते हैं . मस्जिद तोड़ दी जाती है तो पहली विक्षुब्ध ललकार प्रभाष जोशी की ही होती है. आपातकाल के दौरान प्रभाष जोशी एक आन्दोलन के रूप में उभरते हैं.
प्रभाष जोशी प्रेस की आजादी के बहुत बड़े परोकर हुए . प्रवाल मैत्र इसके प्रमाण हैं जो उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री द्वारा अपने अख़बार के विरुद्ध हल्ला बोल झेल रहे थे तब प्रभाष जोशी ही एक मात्र संपादक हुए जिन्होंने उनकी मदद की . प्रभाष जोशी साफ मानते थे की अगर किसी अख़बार से शिकायत है तो भारतीय कानून में इसके लिए व्यवस्था है . और प्रेस काउन्सिल की सुविधा भी है. लेकिन अखबारों के खिलफ सीधी करवाई को किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता . प्रभाष जी की धारणा थी प्रेस की आजादी के लिए लोकतंत्र और कानून व्यवस्था का राज जरुरी है इस लिए अख़बार तथ्यों से समझौता कभी ना करे .
प्रभाष जोशी ने पहली बार कला संस्कृति और सिनेमा के पृष्ठ दिए . इन पृष्ठों का अनुसरण बाद में प्रतिद्वंदी अखबारों ने भी किया . जनसत्ता में कला संस्कृति और सिनेमा का पृष्ठ मंगलेश डबराल जैसे उदभट विद्वान देखते थे. मंगलेश प्रभाष जी के साथ काम करने को एक शब्द में स्वायतता से जोड़ते हैं. प्रभाष जोशी ने जनसत्ता की टीम इक्टठा की , एक जीवंत अख़बार की अवधारणा को उसकी सवेदना में उतारा और उसे कर्मठता वाली आजादी दे दी . मंगलेश जी बताते हैं की जनसत्ता के हर पृष्ठ में प्रभाष जोशी उपस्थित होते थे. हलाकि वे अख़बार के संपादक थे लेकिन प्रूफ रीडर , प्रशिक्षु उपसंपादक , उपसंपादक , मुख्य उपसंपादक और समाचार संपादक भी थे . कहने का तात्पर्य है की प्रभाष जोशी को अख़बार के हर काम का लम्बा अनुभव था.
प्रभाष जोशी कृषि , पशुपालन और किसानो की समस्याओ से हमेशा वाकिफ रहे थे. और इनसे जुडी खबरों को अख़बार में हमेशा जगह दिया करते थे . जोशी जी सुचना के अधिकार के पैरोकार थे . उन्होंने यहाँ तक कहा था - सूचना के अधिकार का जो मुददा बहुत पहले पत्रकारों और बुधिजिवियो को उठाना था उसे अब मजदूर और किसानो ने सशक्त ढंग से उठाकर हम पर उपकार किया है. इन शब्दों ने किसानो मजदूरों को नई उर्जा से भर दिया तब से सूचना के जन अधिकार के आन्दोलन को प्रभाष जी का मूल्यवान सहयोग निरंतर मिलता रहा.
भाषा को लेकर प्रभाष जी सरोकारों की पवित्रता मानद रही है. प्रभाष जी ने हिंदी पत्रकारिता को एक नया मुहावरा दिया , वाचिक परम्परा को लिखे हुए शब्द की परम्परा से जोड़ा और दर्जनों अखबारों ने भाषा के इस मुहावरे को अपनी शक्ति बनाया और सफल भी हुए . प्रभाष जोशी का तत्कालीन राजनीती के जितने घाटो में अधिकार पूर्वक आना जाना था वैसे में प्रभाष जी राजनीती के अच्छे खासे मठाधीश बन सकते थे, लेकिन न तो व्यक्तित्व या आचरण में न ही लेखनी और भाषा में प्रभाष जी ने राजनितिक पूर्वाग्रह को स्थान दिया .
प्रभाष जोशी को पढ़ते हुए ऐसा लगता है की प्रभाष जोशी एक व्यक्ति और संस्था से ऊपर एक युग या काल का नाम है. प्रभाष जोशी विशुद्ध सम्पादकीय परम्परा के अंतिम स्तंभ रहें हैं. उनके बाद के सारे संपादक महज प्रबंधक ही रहे . देखा जाये तो प्रभाष जी का जाना स्वंत्रता पूर्व की सम्पादकीय परम्परा का अवसान ही है.... इसमे सुखद यही रहा की पत्रकारिता के स्वर्ण युग का इति एक गौरव पूर्ण उतराधिकारी के साथ पूर्णता को प्राप्त हुआ .
प्रभाष जोशी अपने बाई पास सर्जरी के दौरान हौसला बंधने के लिए
" अभी न होगा मेरा अंत " कविता के ये पंक्तिया अक्सर गुनगुनाया करते थे . ये अमर पंक्तिया महाकवि निरला की हैं जिसे प्रभाष जोशी ने अपनी ताकत बनाया था . प्रभाष जोशी को नैतिक आत्मबल देने वाली ये पंक्तिया कहीं न कहीं असमय मृत्यु की ओर जा रही मिशनरी पत्रकारिता का इच्छा गान है. लेकिन यह तब ही संभव है जब नए पत्रकार प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की परम्परा को आत्म सात करें ओर सार्थक समूह गान के साथ पत्रकारिता के वास्ते गाए - अभी न होगा मेरा अंत . शायद हम भी यही उम्मीद , आशा , और विश्वास मान कर चलें की प्रभाष जोशी अपने मिशनरी संस्कार वाले पत्रकारिता की परम्परा में रचे बसे रहें ...... हिंदी पत्रकारिता के आखरी महान संपादक को यही सच्ची श्रधांजलि हो सकती है...........
-----अभिषेक कुमार शास्त्री----
-----अभिषेक कुमार शास्त्री----
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