सोमवार, 4 नवंबर 2013

इस कला ने छुड़ाया अपनी देहरी अपना अंगना

प्रकृति प्रदत विशष्ट कला के कारण अंग्रेजो ने स्थानीय आदिवासियों को किया था माइग्रेट

अभिषेक कुमार शास्त्री


आदिवासी प्रकृति के साथ परजीविता के आधार पर आश्रित हैं। जंगलों पहाड़ो में सदियों से रहते हुए आदिवासियों ने प्रकृति के बेहतर उपयोग को जाना और समझा। प्रकृति के साथ इसी सहभागिता में आदिवासियों ने कुछ विशष्ट कलाएं सीखीं। इन्ही कलाओं में एक है, आदिवासी महिलाओं के द्वारा जंगल से पत्ता चुनने की कला। जंगली पौधो के पतों को उनकी उपयोगिता के आधार पर परखने की इसी कला के मुरीद आज से 150 साल पहले अंग्रेज भी हुए थे। तब अंग्रेजों ने झारखंड के वन क्षेत्रों से हजारों आदिवासियों को असम के चाय बगानों में माइग्रेट किया था । चाय बगानों में इन आदिवासियों को मजदूर बनाकर रखा गया। जैसे जैसे अंग्रेजों  ने चाय बगानों का विस्तार किया इस क्षेत्र से आदिवासियों को जबरदस्ती चाय के बगानों में माइग्रेट किया जाता रहा । आज तकरीबन पौने दो लाख आदिवासी असम के चाय बगानो में है, जो उन माइग्रेट आदिवासियों के वंशज हैं । इन्हें वहाँ के समाज मे “टी ट्राइब्स” के नाम से जाना जाता है । जहां इनकी जिंदगी आम स्थानीय समुदाय से दोयम दर्जे की है । पूरे विश्व भर में कला या संस्कृति के आधार पर लेबर माइग्रेशन का यह अपनी तरह का अनुठा उदाहरण है। जनसंख्या विज्ञान और पलायन के शोधार्थी इस तरह के माइग्रेशन को बाइफोर्सड माइग्रेशन (जबरन पलायन) मानते हैं।

सभी आदिवासी जनजातियों में है यह कला

जंगली पौधों से पत्ता तोड़ने की यह कला झारखंड के सभी प्रमुख आदिवासी जनजातियों में परंपरा एवं  संस्कृति का हिस्सा रही है। मुंडा, उरांव, खड़िया, असुर, नगेसिया, विरजिया, और पहड़िया आदिवासी जनजाती की महिलाएं पत्ता तोड़ने की कला में माहिर होती हैं। बाजार और घर के लिए कौन से पत्ते बेहतर होंगे यह जानकारी उन्हे खूब होती है । आज भी दोना एंव पत्तल बनाने के लिए आदिवासी महिलाएं हर दिन जंगल से सखुआ के पत्ते तोड़तीं हैं। यह कला आदिवासी बच्चे विरासत की तरह सीखते जाते हैं । आज भी आदिवासियों मे यह कला विद्यमान है । जंगली घांस-फुस के बीच उपयोगी और खाने योग्य साग और पतों का चयन करना इन महिलाओं को आज भी बखुबी आता है।
 
लोहरदगा का चाय डिपो, माइग्रेशन का था केंद्र

असम के चाय बगानों में आदिवासियों को भेजने और चाय के व्यवसाय को क्षेत्र में फैलाने के लिए एक डिपो लोहरदगा में भी था। टी डिपो लिमिटेड नाम से लोहरदगा के भंडरा रोड में स्थित उक्त चाय डिपो से आदिवासियों को माइग्रेट किया जाता है। बाकायदा यहाँ आदिवासियों को स्वास्थ जांच किया जाता था और फिर उन्हे चाय बागानो मे भेजा जाता था । लोहरदगा सेंटर से गुमला, सिमडेगा और जशपुर से लेकर लातेहार तक के आदिवासियों को चाय बागानो के लिए शिफ्ट करने का काम किया जाता था ।  साथ ही असम से उत्पादित चाय की पत्तियों को लाकर इसी डिपो से गुमला, सिमडेगा से होते हुए उड़ीसा तक पहुंचाया जाता था । साथ ही लातेहार, डाल्टेनगंज गढ़वा से होते हुए छतीसगढ़ तक चाय की पतियों को भेजा जाता था। फिलहाल उक्त चाय डिपो की जगह उर्सलाइन गर्ल्स हाई स्कूल और मिशन हॉस्पीटल का निर्माण किया गया है है। बाद मे यहाँ की संपति को चाय डिपो के मालिकों ने मिशनरी संस्था को सौंप दिया था। जनसंख्या विज्ञान के शोधार्थी कुणाल केसरी का कहना है की असम और बंगाल मे इस तरह का माइग्रेशन आज से 200 वर्ष पहले का है । अंग्रेज़ चाय के व्यवसाय मे तेजी से जुटे थे । असम और कई दूसरे उतर – पूर्वी भारत के क्षेत्र मे इसका विस्तार किया जा रहा था । चाय बागानो मे पुरुष आदिवासियों को लगाया जाता था और महिलाएं बागानो से पत्ते तोड़ने का काम काज करती थीं । स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं की बड़ी संख्या मे आदिवासी परिवारों को जबरन चाय बागानो मे ले जया गया । 

बदतर स्थित में है माइग्रेट आदिवासी

समुचे झारखंड से माइग्रेट आदिवासी असम में बदतर स्थित में जिंदगी जी रहे हैं। इन आदिवासियों को स्थानीय सरकारी सुविधा तक नहीं दी जा रही है। इधर इनका अपने पुश्तैनी क्षेत्र से भी संबध नहीं रह गया है। आज इन आदिवासियों की स्थित न घर न घाट की तरह है। नतीजन वे मुख्य धारा से अभी तक वंचित हैं। आज ये आदिवासी अपनी माटी से तो बिछड़ ही चुके हैं। वहां भी ये विकास के लाभों से वंचित हैं।


प्रकृति के साथ निकटता दर्शाती है यह कला

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची के पूर्व अध्यक्ष डॉ. गिरधारी राम गंझू, कहते हैं आदिवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन रहा है। जंगल पर निर्भरता ने इन्हे जंगल के उत्पादों को बाजार तक पहुंचा कर सामाजिक व्यवसाय दिया। जंगल से निकटता ने ही इनमें पत्ते तोड़ने की विशष्ट कला दी। बाजार और घर के लिए कौन सी पत्ती सही होगी ये आदिवासी जानते हैं। आदिवासी जंगल से फुटकल, चकोड़, कोयनार, बाधुर, कटई, बेंगसाग एवं हरा भाजी सहित कुल 70-80 तरके सागों की पहचान करते हैं। इनकी यह विशष्ट शैली आज तक कायम है। अंग्रेजों ने माना की ये आदिवासी चाय की बगानों मे  बेहतर पत्ती का चयन कर सकते हैं। जिस कारण इन्हे बलपूर्वक ले गए।

यह एक तरह का परमानेंट माइग्रेशन का उदाहरण है

जनसंख्या विज्ञान और पलायन के शोधार्थी कुणाल केसरी बताते है की आदिवासियों की विशष्ट कला के आधार पर अंग्रेजों ने इन्हे लेबर बनाकर माइग्रेट किया था। कल्चर बेस्ट लेबर माइग्रेशन का यह अनुठा उदाहरण है। आदिवासियों को अशिक्षा और गरीबी जैसे कारणों से कहीं भी बाहर शिफ्ट करना आसान था। वैसी भी अंग्रेजों ने लेबर माइग्रेशन के तहत बिहार, उत्तरप्रदेश के हजारों लोगो को मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, और नार्दन अमेरिका जैसे जगहों पर माइग्रेट किया था। आदिवासीयों को चाय के बागानो मे जबरन ले जाकर शिफ्ट करने का यह मामला अब परमानेंट माइग्रेशन का विषय बन गया है। असम और दूसरे उतर-पूर्वी क्षेत्र मे ले जाए गए आदिवासियों को वापस अपने राज्य नहीं लौटने दिया गया ।