शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

इस नक्सलियापा से कुछ भी हासिल नहीं होगा ...

उधार के सिद्धांत ओढ़ कर बंदूक की नली से सत्ता बदलने की ललक अब बेकार की बातें हैं ... बदल कुछ नहीं रहा है ... बस बर्बाद हो रहा है ... गाँव का सुकून, पहाड़ों की खूबसूरती, और युवाओं का अरमान ... बंदूकें दोनों तरफ लगी हुयी हैं और लाशें ही गिर रही है ...  कोई हवालदार, थानेदार, एसपी और जवान शहीद हो रहा है तो कहीं कमांडर और  कामरेड " शहीद " हो रहे हैं ... लेकिन देखिए की विधवा कोई पत्नी हो रही , गोद किसी माँ की उजड़ रही है, और कोई बहन अपने भाई को खो रही है ...  1970 से अबतक 43 वर्षों में बंदूक की नली ने सिर्फ घरें ही उजाड़े हैं ..  
                                                              दरअसल, जिन मजलूमों, शोषितों, और आदिवासियों के नाम पर बंदूक थामे जा रहे हैं खुद वो ग्रामीण जंगलों और  पहाडों में बेबस, लाचार, और गुमनाम से हो गए हैं ... अब भी इन पहाड़ों में कोई माँ जब बच्चा जन्मती है तो उस बच्चे के सर पर नक्सली और छाती पर गोली लिख जाती है ... जंगल की गुमनामी में पैदा होने वाले ये बच्चे जंगल के अँधेरे में ही भटकते हैं और इसी जंगल में कहीं दफ़न भी हो जा रहे हैं ... 
                                                                          दरअसल, अगर सरकार इन से मुह फेरे है तो ये नक्सली भी उनके लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं ... विकास जो पहुँच सकता है, जो विकास पहुँच सका है सिर्फ उसे बर्बाद किया जा रहा है ... हासिल कुछ नहीं हो रहा है .. बस नक्सलियापा कर लुट रहे हैं ... विकास का पैसा .. ग्रामीणों और आदिवासियों का हक़ ... माओ के सैद्धांतिक दतक पुत्रों अब रहम करो माओं की गोद ना उजाड़ो ... अब इतना तो समझो की लोकतंत्र का सामना लोक तंत्र से ही होगा ...