शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

किताबों सी जिदगी .....

किताबों में जिंदगी ढूंढता हूँ तो ,
अक्सर जिंदगी हीं किताब नज़र आती है .
मन है की किताबों के पन्नो में अटका रहता है
और जिंदगी है की इन्ही पन्नो में उलझ जाती है .
हर रोज़ कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ और ,
जिंदगी को जीता रहता हूँ
इस तरह जीने में कई पन्ने कोरे ही रह जाते हैं ,
और कई पन्ने पढ़े भी नहीं जाते .
जिंदगी इसी तरह चलती जाती है
और किताब है की पूरी हो जाती है
फिर भी लगता है बहुत कुछ बाकि रह गया है
शायद जीना या............ लिखना ?